शहतूत




















आज एक अरसे बाद शहतूत खाया
यूँ लगा कि बचपन फिर लौट आया

घर के सामने ही शहतूत का पेड़ था
सब बच्चे उसपे झट से चढ़ जाते थे
शहतूत खातेकहानियाँ सुनाते थे
बचपन में हम दोपहर यूँ बिताते थे 

हाईजीन की तब किसको फ़िक्र पड़ी थी 
कंधे पे था बस्ता, क़दमों में दुनिया पड़ी थी 

अब पैकेजड फ़्रूट्स का दौर चल पड़ा है 
शहतूत और फ़ालसे का धंधा मंद पड़ा है

फ़िट्नेस की होड़ में, ज़िंदगी के लुत्फ़ गए भूल 
गाँव भी शहर हो चले, वो भी बन गए कूल 

हाईटेक बन कर ख़ुशियों के पैमाने बदल गए
आधुनिक बने तो ज़िंदगी के मायने बदल गए

सोचता हूँ क्या कुछ पीछे छोड़ आया 
आज एक अरसे बाद शहतूत खाया 
यूँ लगा कि बचपन फिर लौट आया

मुसाफ़िर 



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