ज़िंदगी कमाल करती है


ज़िंदगी कमाल करती है
उम्र सी थकती नहीवक़्त सी दौड़ती रहती है
गुज़रे लम्हे मिटाकरनए लम्हे इजात करती है
बाँचती है बारीकी सेकर्मों का लेखा जोखा
रात के ख़्वाबों का दिन में हिसाब करती है
ज़िंदगी कमाल करती है

नरम घास पे लेट टिमटिमाते तारें देखती है
खिल उठती है ये जब उगता है सूरज
बहते है झरने, और नदी कलकल करती है 
बिखरे पड़े है नज़ारे चारों ओर
पर देखने की फ़ुर्सत किसको मिलती है
इतनी बड़ी दुनिया, तो क्यूँ इतनी छोटी है ज़िंदगी
कभी कभी ये मलाल करती है
ज़िंदगी कमाल करती है

मिलती है जब बचपन की गलियों में
बेपरवाह सी मस्त फिरा करती है
जवानी की गलियों में कभी जाओ तो,
ये यारों में और वादों में मिला करती है
उलझा दिया क्यूँ मुझे, रोज़ी रोटी और चाकरी में
आज मिलती है तो ये सवाल करती है
ज़िंदगी कमाल करती है

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