फिर से चला शहर मैं

फिर से चला शहर मैं
इन वादियों को छोड़ के
साँस में थोड़ा धुआँ घोलने
रोटी कमाने की होड़ में

ज़िंदगी के मायने बदल जाते है
पहाड़ों की गोद में
अजब छटा बिखेरता है चाँद भी
बादलों की ओट में
ये गाँव बुलाते है अपनी ओर
हरियाली ओढ़ के
फिर से चला शहर मैं
इन वादियों को छोड़ के

इस मुर्दा शहर में
गाड़ियाँ धुआँ और आदमी ज़हर उगलता है
तारे फीके पड़े और गर्मी से सूरज पिघलता है
एक की ख़ुशी देख दूसरे का सीना जलता है
ज़िंदगी है सस्ती यहाँ किसको फ़र्क़ पड़ता है

सुनहले सपनो को तोड़ के
घरौंदा बनाने तिनके जोड़ के
फिर से चला शहर मैं
इन वादियों को छोड़ के ।

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