कुछ ऐसा अपना मिज़ाज रहा


बहुत कुछ लिखा तुम्हारे बारे में
आज कुछ अपनी सुनाता हूँ
शायद कोई लुफ़्त ले हममें भी
अल्फ़ाज़ों से अपना मिज़ाज बताता हूँ ।

वफ़ा करना फ़ितरत रही अपनी
बेग़ाने भी वक़्त बेवक्त याद आते रहे
ख़्वाबों पर उनका ही रुआब रहा,

अजीब कश-म-कश में रही ज़िंदगी
मुसीबतें कभी कम ना रही, मगर
चेहरे पे हँसी का हिजाब रहा
कुछ ऐसा अपना मिज़ाज रहा ।

यूँ तो ज़िंदगी में रिश्तों की कमी ना रही
जो जुड़ा वो उम्र भर साथ रहा
बस तुम्हारी ही ज़िंदगी के बहिखाते में
अपना सिर्फ़ चंद पन्नो का हिसाब रहा
कुछ ऐसा अपना मिज़ाज रहा ।

बहुत शिद्दत से निभायी दोस्ती हमने
दुश्मनो को बख्शने का सलीक़ा ना रहा
करम देखे जो कोई हमारे
कुछ बे-अदब, कुछ बे-तरीक़ा ना रहा

इश्क़ का शौक़ फ़रमाया कुछ इस क़दर
कि दिन रात का ना लिहाज़ रहा
कुछ ऐसा अपना मिज़ाज रहा ।

- शुभम (मुसाफिर)

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