कल रात मैंने एक ख्वाब देखा

कल रात मैंने एक ख्वाब देखाकल रात मैंने एक ख्वाब देखा
मेरे हाथ मे, तुम्हारा हाथ देखा
किताब में छिपा एक गुलाब देखा
बीतें लम्हो में दबा एक राज़ देखा
कल रात मैंने एक ख्वाब देखा ।

रिश्ता जो डूब गया था वक़्त में कहीं
उसे किनारे पे तैरता, आबाद देखा
रत्ती भर फासला न था दरमियान
अपने हर सवाल का जवाब देखा
अनकही बातों का सैलाब देखा
कल रात मैंने एक ख्वाब देखा ।

हँसी खेलती थी जिस चेहरे पर,
उस चेहरे को मैंने उदास देखा,
मेरी रूह को छूतीं थी जो आंखें
उन आँखों पे शर्म का लिबास देखा,
अपने होकर भी तुम बेगाने से लगे
तुमपे झूठ का एक नकाब देखा
कल रात मैंने एक ख्वाब देखा ।

ख्याल और हकीकत में फर्क न रखा
फ़ना होते खुद को बेहिसाब देखा
कल रात मैंने एक ख्वाब देखा ।

Comments